शिकारी देवी मंदिर मंडी हिमाचल प्रदेश :इतिहास, मान्यताएं और यात्रा की पूरी जानकारी
शिकारी देवी मंदिर मंडी हिमाचल प्रदेश :इतिहास, मान्यताएं और यात्रा की पूरी जानकारी
नमस्कार दोस्तों आज मैं आपके लिए एक ऐसे अद्भुत और रहस्यमयी माता के मंदिर के बारे मैं लेख लेकर आया हूँ जो हिमाचल प्रदेश की प्यारी सी धरती की बर्फ़ीलो पहाड़ो की चोटी पर स्थित है।
शिकारी देवी जी का मंदिर हिमाचल प्रदेश में हैं। यह स्थान हिमाचल की छोटी काशी मंडी के करसोग में विराजमान हैं। यह स्थान प्रकृति की अद्भुत सुंदरता से भरपूर हैं। माता शिकारी देवी जी का मंदिर पहाड़ी की चोटी पर स्थित है और मंदिर के चारों ओर बहुत ही सुंदर नजारा हैं यहाँ पर लोग दूर-दूर से आते हैं ओर माता रानी उनके मन की मुरादे पूरी करती हैं। मंदिर के चारों ओर के पहाड़ बर्फ की चादर से ढके हुए हैं जो बहुत ही सुंदर और मनमोहित करने वाले होते हैं।
माता शिकारी देवी जी का मंदिर का सफर बहुत ही सुहाबना होता हैं क्योंकि यह मंदिर चोटी पर स्थित हैं। यहाँ पहुचने के लिए बहुत सी सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं, लेकिन यहाँ का शांत वातावरण आपको चोटी तक पहुंचाने में सहायता करेगा।
यहां पहुंचते ही आप में एक अलग सा सुकून मिलेगा।माता के मंदिर के रास्ते में आपको प्रकृति के अद्भुत नज़ारे देखने को मिलेगे। सर्दियों में यहाँ पर बहुत बर्फ मिलेगी जिस कारण यहां की आवाजाहि पर रोक लगा दी जाती है।
इस मंदिर से सबंधित बहुत सी मान्यताए हैं। यह मंदिर मंडी जिला से 85 किलोमीटर की दूरी पर स्थित हैं। माता शिकारी देवी जी का इतिहास शिकारी देवी माता का मंदिर एक अद्भुत बात के लिए बहुत लोकप्रिय हैं। इस मंदिर के ऊपर छत नहीं हैं। इस बात को लेकर बहुत सी मान्यताएँ हैं। माना जाता हैं की यहाँ पर मारकंडा ऋषि ने तपस्या की थी और उसके बाद यहाँ पर माता दुर्गा जी यहाँ पर विराजमान हुई थी। माना जाता हैं की पांडव वनवास के दौरान यहाँ पर आए हुए थे। तब यहाँ पर माता दुर्गा ने पांडवो को दर्शन दिये थे, और आगे चल कर जो महाभारत का युद्ध होना था उसके लिए विजय का आशीर्वाद दिया था।यह भी माना जाता है कि पांडवो ने ही यहां पर मंदिर निर्माण का कार्य शुरू किया लेकिन किसी कारण वश वे इस कार्य को पूरा न कर पाए। । शिकारी देवी से सम्बंधित एक और बात है कि पुराने समय में शिकारी यहां शिकार के लिए आते थे। यह स्थान जंगल से घिरा हुआ था, तो शिकारी माता के दर्शन करके शिकारी शिकार किया करते थे, जिस से वे शिकार में सफल भी होते थे। शायद इसलिए भी माता का नाम शिकारी माता पड़ा।
शिकारी देवी जाते समय रास्ते में पांडव शीला आती हैं जो एक हाथ लगाने से हिलती हैं लेकिन यदि पूरी ताकत लगाई जाए तो नहीं हिलती हैं। इस शीला को भीम शीला के नाम से भी जाना जाता हैं।
माता शिकारी देवी मंदिर में के रास्ते में पानी के बहुत से स्त्रोत मिलते हैं जो जड़ी-बूटी युक्त हैं। यह पानी अमृत के सामान होता हैं। शिकारी देवी के मंदिर से नीचे की तरफ एक नाला हैं जहां पर बारह महीने काफी पानी रहता है।
भुलाह और रायगढ़ में आपको खाने-पीने के लिए दुकाने आदि की वयवस्था भी हैं और विश्राम करने के लिए यहां पर guest house की भी व्यवस्था है। सर्दियों में यहां पर्यटक बर्फबारी का मज़ा लेने के लिए भी आते हैं। भुलाह में एक छोटा से ग्राउंड हैं जहां पर पर्यटक snow games का आनंद भी लेते हैं।
घूमने के लिए बूढ़ा केदार भी स्थान पर्यटन की दृष्टि से बहुत ही महत्वपूर्ण हैं। यहां जल का बहुत ही सुंदर नज़ारा हैं। यह चारों ओर से हरे भरे जंगलो से घिरा हुआ है। यहां पर शिव की पूजा की जाती है और यहां स्थित गुफा में भोले नाथ जी की पिंडी भी स्थापित हैं।
माता शिकारी देवी जी के मंदिर के लिए कुछ लोग ट्रैकिंग करते हुए भी आते हैं। यहां के लिए ट्रैकिंग करते हुए आना काफी मुश्किल लेकिन रोमांचक सफर हैं। यहाँ पर कई तरह के जंगली जानवर पाये जाते हैं। लोग यहां के लिए ट्रैकिंग छतरी, करसोग, चैलचौक और कमरुनाग से होते हुए करते हैं।
नवरात्रो में माता शिकारी देवी के दरबार में मेले तथा भंडारे का आयोजन किया जाता हैं। यहां के जंजैहली में मेले का आयोजन किया जाता हैं। जंजैहली शिकारी माता को जाते समय रास्ते में आता हैं। नवरात्रों के समय शिकारी देवी मंदिर में भंडारे लगाए जाते हैं जिस में अलग-अलग जगह से आए हुए ट्रस्ट समूह भंडारे का आयोजन करते हैं।
शिकारी देवी में सर्दियों के मौसम में भारी बर्फ पड़ती हैं जिस से यहां के लिए आवाजाही बंद कर दी जाती है, ताकि पर्यटको को कोई जान माल का नुकशान न हो। परंतु जब हल्की बर्फवारी होती हैं तो नज़ारा बहुत ही अद्धभुत होता हैं। बर्फवारी के दौरान यहां आकर ऐसा प्रतीत होता है मानो जैसे हम स्वर्ग में हो गए हों और माता शिकारी देवी मंदिर की खाश बात व रहस्यमयी बात यह भी है की इस मंदिर के ऊपर किसी भी प्रकार का छत नहीं है और माता रानी की मूर्तियों पर बर्फ भी नहीं गिरता।
शिकारी देवी में ठहरने की भी उचित वयवस्था हैं। यहां पर पर्यटक मंदिर सराये में रह सकते हैं जिसके लिए मंदिर परिसर के पुजारी से सम्पर्क किया जा सकता है। यहां पर लोक निर्माण विभाग और वन विभाग के भी रेस्ट हाउस बने हुए हैं। यहां पर आपको बहुत सी दुकाने भी मिल जाएगी जहां पर आप अपनी जरूरत का सामान खरीद सकते हैं।
यदि आप मंडी से आ रहे हैं तो आप जंजैहली रूट की बस ले कर या टैक्सी लेकर जा सकते है। मंडी से जंजैहली 80 किलोमीटर की दूरी पर हैं। जंजैहली से भुलाह या रायगढ़ तक बस सुविधा है, परंतु ये नहीं कहा जा सकता की हर समय आपको बस मिल जाये। शिकारी देवी पहुंचने से पहले आपको अगर आप ट्रेकिंग के शौकीन हैं तो भुलाह से आगे का सफर आप पैदल तय कर सकते हैं। जंजैहली से आप टैक्सी सर्विस ले सकते हैं जो आपको मंदिर की सीढ़ियों तक छोड़ के आती हैं। यहां से आगे आपको पैदल सफर करना पड़ता हैं।
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