हिमाचल प्रदेश में बरसात के अंत भगवान का शुक्रिया करने के लिया मनाया जाने वाला अद्धभुत त्यौहार: सैर

हिमाचल प्रदेश का सैर त्योहार (Sair Festival): कब और क्यों मनाया जाता है? पूजा विधि और महत्व

सैर (sair) का त्यौहार अश्विन महीने की सक्रांति को मनाई जाती है। वास्तव में यह त्यौहार वर्षा ऋतु के खत्म होने और शरद् ऋतु के आगाज के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। इस समय खरीफ की फसलें पक जाती हैं और काटने का समय होता है, तो भगवान को धन्यवाद करने के लिए यह त्यौहार मनाते हैं।

सैर का त्यौहार हिमाचल में फसल के मौसम के अंत को चिह्नित करने के लिए मनाया जाने वाला त्यौहार है सैर एक सांस्कृतिक त्योहार है जो हिमाचल के कई हिस्सों में मनाया जाता है जैसे कुल्लू, सोलन, मंडी आदि जिलों में मनाया जाता है। हालाँकि, यदि आप भारत के इस प्रसिद्ध सांस्कृतिक उत्सव को इसके पूरे गौरव के साथ अनुभव करना चाहते हैं तो आपको शिमला जाने की आवश्यकता है।

सैर (sair) एक सदियों पुराना त्योहार है और इसमें कार्निवल, ढोल पीटने और तुरही बजाने के रूप में उत्सव मनाया जाता है। इस दिन लोग बर्तन, कपड़े जैसी कई चीजें भी खरीदते हैं और भल्ले , कचौरी और मिर्च जैसे कई स्वादिष्ट व्यंजन बनाते हैं ।

कई स्थानों पर, ग्रामीण आगामी कठोर सर्दियों के दिनों के लिए जलाऊ लकड़ी के साथ-साथ खाद्यान्न का भंडारण भी शुरू कर देते हैं। हालांकि, सैर का प्रमुख आकर्षण सांडों की लड़ाई है। 

सैर (sair) की पूजा कैसे की जाती है

आईये जानते है सैर की पूजा कैसे की जाती है सैर पूजन के लिए सैर से पिछले दिन से ही कुछ इंतज़ाम करने पड़ते हैं क्योंकि अगले दिन सुबह ही पूजा करनी पड़ती है। धान का पौधा, तिल का पौधा, दाड़ू(अनार का छोटा रूप या पहाड़ी रूप ), पेठा, मक्की, ककड़ी(खीरा ), कोठा का पौधा, खट्टा, कचालू का पौधा, अखरोट, और कई प्रकार के बनाये हुए व्यंजन,पुराना सिक्का आदि जुटाया जाता है। फिर इन्हें आंगन या ओटे में रख दिया जाता है। अगली सुबह इस टोकरी को पूजा वाली जगह लाकर रखा जाता है, गणेश जी की स्थापना होती है और इस पूरी सामग्री की पूजा की जाती है। ठीक उसी तरह से जैसे सामान्य रूप से पूजा की जाती है।

क्यों मनाई जाती है सैर

पहले के दौर में न तो टीकाकरण होता था न ही बीमारियों के इलाज के लिए डॉक्टर। बरसात के दिनों में पीने के लिए स्वच्छ पानी भी उपलब्ध नहीं होता था। ऐसे में बरसात के दिनों में कई संक्रामक बीमारियां फैल जाया करती थीं जिससे इंसानों और पशुओं को भी भारी नुकसान होता था।

प्राचीन काल में ज़ब एक दूसरे से सम्पर्क करने का कोई साधन नहीं था तो लोग बरसात के अंत में इस त्यौहार अपने रिस्तेदारो के साथ को मनाते है।बरसात में होने वाले नुकसान के लिए वही उत्तरदायी है। फिर जैसे की भारी बारिश का दौर खत्म होता, लोग इसे उत्सव की तरह मनाते। यह एक तरह का जश्न था कि बरसात बीत गई और हम सुरक्षित रहे। फिर सैर वाले दिन लोग दरअसल प्रकृति का शुक्रिया अदा करते थे कि चलो, अनहोनी नहीं हुई।

पूजा के बाद विसर्जन जरूरी

परिवार के सभी सदस्य सैर पूजते हैं सैर के दिन ही लोग अपनी राखिया उतार कर और और उसे सैर को पहनाकर प्रार्थना करते हैं कि हर साल इसी तरह सुखदायी रहना। इसके बाद कुछ इलाकों में सैर की टोकरी को गोशाला में घुमाया जाता है और फिर चलते पानी में प्रवाहित कर दिया जाता है।

तो इस बार भी बरसात अच्छे बरसात निकल गई। इसलिए प्रकृति को शुक्रिया, आपको भी सैर मुबारक हो। आने वाला साल आपके लिए संपन्नता और अच्छा स्वास्थ्य लाए। 

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शुभकामनाएं।

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